नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद बांकीपुर सीट पर होने वाले चुनाव के परिणामों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कहा जाता है कि यहां का चुनाव सिर्फ विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह चुनाव बिहार की राजनीतिक दिशा और दशा को भी दर्शाता है।
इस बार जन सुराज, भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा और आरजेडी की रेखा गुप्ता के बीच चल रहे इस मुकाबले में कौन जीतेगा? यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि इस सीट से कई बार ऐसे नतीजे सामने आए हैं जिन्होंने सबको चौंका दिया है।
बांकीपुर सीट का इतिहा
बिहार के पटना शहर में मौजूद बांकीपुर सीट को पहले ‘पटना पश्चिम’ सीट के नाम से जाना जाता था। 2008 में हुए परिसीमन के बाद इस सीट को बांकीपुर नाम मिला। 1957 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुआ था, तब राम शरण साव विधायक चुने गए थे। इसके बाद 1962 में कांग्रेस पार्टी के कृष्ण वल्लभ पंत यहां से विधायक बने।
1967 के चुनाव में महामाया प्रसाद सिन्हा विधायक बनकर आए। उनके इस्तीफे के बाद 1969 में हुए उपचुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के ए.के. सेन जीते, जिसके बाद यहां लगातार कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव रहा। 1977 में जनता पार्टी की लहर में ठाकुर प्रसाद यहां से विधायक बने, जबकि 1980 के चुनाव में वापस कांग्रेस ने जीत दर्ज की।
लेकिन 1985 के विधानसभा चुनाव ने फिर से सबको चौंका दिया, जब निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव को यहां के लोगों ने चुना। इस नतीजे को यहां के बड़े राजनीतिक उलटफेर में गिना जाता है। इसके बाद यह साबित हो गया कि यह सीट किसी भी दल को एकतरफा स्वीकार नहीं करती।
1995 का दौर और भाजपा का गढ़
राजनीतिक उलटफेर के बीच यह सीट लगातार बिहार की चर्चित राजनीतिक सीटो में बनी रही। फिर 1995 का दौर आया, जब भाजपा नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा विधायक बने। इसके बाद 2000 और फिर 2005 के चुनाव में भी भाजपा के नवीन किशोर लगातार विधायक रहे।
2006 में नवीन किशोर के निधन के बाद उनके बेटे नितिन नवीन यहां से विधायक चुने गए। 2008 के परिसीमन के बाद बांकीपुर विधानसभा अस्तित्व में आई, लेकिन भाजपा और नितिन नवीन का गढ़ वैसा ही बना रहा।















