बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को रद्द कराने की मांग पर दायर याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने जन सुराज पार्टी की याचिका को खारिज कर दिया और पहले हाईकोर्ट जाने की सलाह दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियां काफी सख्त रहीं, जिनमें चुनावी प्रक्रिया और न्यायालय के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
इस मामले में याचिका दायर करने वाली जन सुराज पार्टी के संस्थापक PK की राजनीतिक रणनीति और कानूनी रास्ते पर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनौती देने से पहले संवैधानिक रास्तों का पालन जरूरी है।
PK: सुप्रीम कोर्ट में सख्त टिप्पणी, पहले हाईकोर्ट जाने की सलाह
सुनवाई के दौरान Supreme Court of India ने जन सुराज पार्टी से सवाल किया कि उन्होंने सीधे शीर्ष अदालत का रुख क्यों किया। कोर्ट ने कहा कि चुनावी विवादों के लिए पहले संबंधित हाईकोर्ट जाना चाहिए, न कि सीधे सुप्रीम कोर्ट आना।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि हाल के वर्षों में कुछ याचिकाएं न्यायालयों का इस्तेमाल राजनीतिक लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कर रही हैं, जो उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह चुनावी प्रक्रिया में तभी हस्तक्षेप करता है जब संवैधानिक उल्लंघन के ठोस और प्राथमिक साक्ष्य सामने हों।
सुनवाई के बाद जन सुराज पार्टी (PK) ने अपनी याचिका वापस ले ली। पार्टी के वकील ने दलील दी कि चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू रहते हुए महिला वोटरों के खातों में 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए, जो चुनावी नियमों का उल्लंघन है। हालांकि कोर्ट ने इसे तथ्यात्मक विवाद मानते हुए पहले हाईकोर्ट में उठाने की बात कही।
याचिका में लगाए गए आरोप और आगे की रणनीति
याचिका में दावा किया गया था कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान राज्य सरकार ने चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन किया। आरोप के मुताबिक, चुनाव प्रक्रिया के बीच लगभग 15,600 करोड़ रुपये की राशि महिला मतदाताओं के खातों में ट्रांसफर की गई, जिससे मतदाताओं को प्रभावित किया गया।
जन सुराज पार्टी का तर्क था कि यह कदम न तो बजट प्रावधानों के अनुरूप था और न ही किसी पूर्व घोषित नीति का हिस्सा। पार्टी का कहना है कि इस तरह की योजनाएं चुनावी समानता को प्रभावित करती हैं और निष्पक्ष मतदान पर सवाल खड़े करती हैं।
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View Plans →हालांकि अदालत ने इस दलील पर सीधे हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में तथ्यात्मक जांच की जरूरत होती है, जो हाईकोर्ट के स्तर पर बेहतर तरीके से हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले के बाद जन सुराज पार्टी अपनी कानूनी रणनीति पर दोबारा विचार कर सकती है और राज्य स्तर पर मामले को आगे बढ़ा सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि चुनावी वादों, सरकारी योजनाओं और आदर्श आचार संहिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले समय में यह मुद्दा न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी अहम हिस्सा बना रह सकता है।
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