पटना – बिहार में 13 साल पुराने एक मामले में उपभोक्ता को आखिरकार न्याय मिला है। पटना जिला उपभोक्ता आयोग ने वाशिंग पाउडर बनाने वाली कंपनी सर्फ एक्सेल (Surf Excel) को आदेश दिया है कि वह उपभोक्ता को 13.2 लाख रुपए का भुगतान करे। यह मामला 2011 का है, जब पटना के निवासी अमिताभ निरंजन को वाशिंग पाउडर के पैकेट में एक कूपन मिला था, जिसमें 5 लाख रुपए जीतने का दावा किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
साल 2011 में, अमिताभ निरंजन ने सर्फ एक्सेल वाशिंग पाउडर का एक पैकेट खरीदा था। पैकेट में एक कूपन मिला, जिसमें उन्हें 5 लाख रुपए का इनाम जीतने की जानकारी दी गई थी। यह इनाम हिंदुस्तान लिवर लिमिटेड और मुंबई स्थित सर्फ एक्सेल प्रतियोगिता के तहत घोषित किया गया था।
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इनाम के दावे के लिए अमिताभ ने कंपनी से संपर्क किया, लेकिन उन्हें पैसे नहीं दिए गए। कंपनी की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने पर उन्होंने पटना जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
कंज्यूमर कोर्ट में कंपनी की हार
अमिताभ निरंजन की शिकायत पर आयोग ने कंपनी को नोटिस भेजा। हालांकि, कंपनी ने न तो कोई जवाब दिया और न ही अपना प्रतिनिधि पेश किया। अदालत ने कंपनी के इस व्यवहार को गंभीरता से लेते हुए अमिताभ के पक्ष में फैसला सुनाया।
आयोग ने कंपनी को आदेश दिया कि वह मूल इनाम राशि 5 लाख रुपए के साथ-साथ 13 साल के दौरान हुई मानसिक परेशानी, मुकदमे का खर्च और ब्याज सहित कुल 13.2 लाख रुपए का भुगतान करे।
इसे भी पढ़ेन्याय मिलने में क्यों लगे 13 साल?
अमिताभ के लिए यह न्याय पाना आसान नहीं था। 13 साल के लंबे समय में उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी। कंपनी की ओर से लगातार टालमटोल के बावजूद, उन्होंने कंज्यूमर कोर्ट में अपनी शिकायत को मजबूती से पेश किया।
इस फैसले का क्या है मतलब?
यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उपभोक्ता आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कंपनियों को अपनी घोषणाओं के प्रति जिम्मेदार होना होगा और ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
क्या सीख सकते हैं उपभोक्ता?
यह मामला उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है। यदि किसी उपभोक्ता को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो वह उपभोक्ता अदालत में अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है।
निष्कर्ष
पटना जिला उपभोक्ता आयोग का यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा में एक बड़ा कदम है। यह उन उपभोक्ताओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो बड़ी कंपनियों के खिलाफ अपनी लड़ाई में अक्सर हार मान लेते हैं।
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