पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी और कानूनी हलचल तेज हो गई है। आज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee स्वयं Supreme Court of India में पेश होकर अपनी याचिका पर दलीलें रखने की अनुमति मांगेंगी। यह मामला राज्य में चल रही मतदाता सूची प्रक्रिया, लोकतांत्रिक पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, जिस पर देशभर की नजरें टिकी हैं।
मतदाता सूची पुनरीक्षण पर Mamata Banerjee की सुप्रीम कोर्ट में सीधी चुनौती
मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है और इसके जरिए कुछ वर्गों को सूची से बाहर किए जाने की आशंका है। इस मामले में मुख्यमंत्री ने एक अंतरिम आवेदन भी दिया है, जिसमें उन्होंने “पार्टी इन पर्सन” के रूप में अदालत में खुद बहस करने की अनुमति मांगी है।
आज यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। अदालत कक्ष में मुख्यमंत्री की उपस्थिति के लिए उनके नाम से गेट पास जारी किया गया है, जिससे उनके व्यक्तिगत रूप से पेश होने की पुष्टि होती है। यह कदम राजनीतिक ही नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।
चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र पर असर
याचिका में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया को लेकर Election Commission of India की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने भी SIR प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिले, तो इसका असर आगामी चुनावों और मतदाता विश्वास पर पड़ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है। यदि अदालत इस पर कोई व्यापक टिप्पणी या दिशा-निर्देश देती है, तो भविष्य में देशभर में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रियाओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण इसे एक constitutional challenge, electoral roll revision, और voter rights से जुड़ा अहम केस माना जा रहा है।
राजनीतिक संदेश और आगे की राह
मुख्यमंत्री का खुद अदालत में पेश होकर बहस करने का निर्णय एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। इससे यह संकेत जाता है कि राज्य सरकार इस मुद्दे को सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि जनहित और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मानती है। आने वाले दिनों में अदालत की टिप्पणी और आदेश यह तय करेंगे कि SIR जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, समय-सीमा और निगरानी को लेकर क्या नए मानक स्थापित होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई Supreme Court hearing, democracy in India, और West Bengal politics जैसे मुद्दों पर नई बहस को जन्म दे सकती है। वहीं आम मतदाताओं के लिए यह जानना अहम होगा कि उनकी पहचान और मताधिकार की सुरक्षा के लिए न्यायपालिका किस तरह का संतुलन बनाती है।
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