संसद परिसर के बाहर मंगलवार को राजनीतिक बयानबाज़ी उस वक्त तेज हो गई, जब कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने प्रधानमंत्री Narendra Modi और केंद्र सरकार पर Epstein files आरोप लगाए। राहुल गांधी ने अमेरिका से जुड़ी हालिया ट्रेड डील और अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ों के हवाले से सरकार पर दबाव में फैसले लेने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार की घबराहट उसके बयानों और नीतिगत निर्णयों में साफ झलक रही है। बयान सामने आते ही राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई और सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच टकराव और गहरा हो गया।
Epstein files का ज़िक्र और सरकार पर दबाव का आरोप
राहुल गांधी ने संसद के बाहर मीडिया से बातचीत में दावा किया कि हाल के दिनों में सामने आए Epstein files को लेकर सरकार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी दबाव के चलते अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील में देश के हितों से समझौता किया गया। कांग्रेस नेता का कहना था कि यह सौदा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक तौर पर भी भारत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
संबंधित आर्टिकल्स
उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार को देशवासियों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि इस समझौते में क्या शर्तें तय हुईं और किन क्षेत्रों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। राहुल गांधी के बयान के बाद विपक्षी दलों ने भी पारदर्शिता की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर संसद में खुली बहस होनी चाहिए, ताकि जनता को वास्तविक स्थिति का पता चल सके।
सरकार की प्रतिक्रिया और राजनीतिक असर
सरकार की ओर से पहले ही इन आरोपों को खारिज किया जा चुका है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विदेशी दस्तावेज़ों में प्रधानमंत्री का नाम Epstein files होने के दावे निराधार हैं और इन्हें राजनीतिक लाभ के लिए उछाला जा रहा है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता भारत के निर्यातकों और निवेश माहौल के लिए फायदेमंद है और इससे दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब बजट सत्र चल रहा है और विपक्ष सरकार को घेरने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को भी घरेलू राजनीति से जोड़ रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस बयानबाज़ी को लेकर बहस छिड़ गई है, जहां समर्थक और विरोधी दोनों अपने-अपने तर्क रख रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगा। यदि विपक्ष संसद में इस मुद्दे को औपचारिक रूप से उठाता है, तो सरकार को ट्रेड डील और विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर अधिक स्पष्ट जवाब देने पड़ सकते हैं। वहीं, यह मामला चुनावी माहौल में भी असर डाल सकता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दबाव और राष्ट्रीय हित जैसे मुद्दे मतदाताओं के लिए संवेदनशील माने जाते हैं।
फिलहाल, यह साफ है कि सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज होने वाला है, और आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस पर सियासी घमासान जारी रह सकता है।
यह भी पढ़ें:
- रुपया 1.2% मजबूत, Dollar के मुकाबले 90.4 तक पहुंचा
- Rahul Gandhi का चीन पर वार, रक्षा मंत्री ने जताई आपत्ति