22 अप्रैल 2025 को बिहार की सियासत में एक नया मोड़ आया जब जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू ने एनडीए गठबंधन के भीतर अपनी शर्तें खुलकर सामने रख दीं। 20 अप्रैल को पटना में हुई जेडीयू विधायक दल की बैठक के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल बनी हुई है। इस बैठक में खुद नीतीश कुमार मौजूद थे और उन्हीं के सामने ज्यादा मंत्री पदों की मांग उठाई गई।

नीतीश कुमार की मौजूदगी में उठी मांग, BJP सतर्क

20 अप्रैल की जेडीयू विधायक दल की बैठक सामान्य नहीं थी। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में पूर्व मंत्री और नीतीश कुमार के करीबी श्रवण कुमार ने साफ तौर पर कहा कि इस बार जेडीयू कोटे से पिछली बार से अधिक मंत्री बनाए जाएंगे। यह बयान उन्होंने खुद नीतीश कुमार के आश्वासन का हवाला देते हुए दिया। बिहार में कैबिनेट विस्तार को लेकर पहले से ही चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन इस बयान के बाद बातें सियासी दबाव में बदल गईं। भाजपा के रणनीतिकार इसे हल्के में नहीं ले रहे क्योंकि गठबंधन में विभागों की बंदरबांट एक संवेदनशील मसला है। जेडीयू की यह मांग सीधे तौर पर भाजपा के मंत्रियों की संख्या और उनके विभागों पर असर डाल सकती है।

विधानसभा अध्यक्ष पद पर जेडीयू की नजर, BJP की बढ़ी मुश्किल

नीतीश कुमार की पार्टी सिर्फ मंत्री पदों तक नहीं रुकी है। जेडीयू की नजर बिहार विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर भी बताई जा रही है। फिलहाल यह पद भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रेम कुमार के पास है, जो अति पिछड़ी जाति से आते हैं। भाजपा के लिए प्रेम कुमार का एडजस्टमेंट एक जटिल मसला है क्योंकि अति पिछड़ा वर्ग पार्टी का एक अहम वोट आधार है। ऐसे में अगर यह पद जेडीयू को देना पड़ा तो भाजपा को सामाजिक समीकरण बिगड़ने का डर सताएगा। यह भी गौर करने वाली बात है कि बिहार में 33 संभावित मंत्री पदों की सूची में जेडीयू अपना पलड़ा भारी करना चाहती है, जो गठबंधन के भीतर एक नई खींचतान को जन्म दे सकता है।

नीतीश कुमार की ‘हाथी चाल’ क्या है?

नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में से एक माने जाते हैं। उनकी रणनीति को अक्सर ‘हाथी चाल’ कहा जाता है — धीमी, सोची-समझी, लेकिन असरदार। पिछले दो दशकों में वे कई बार गठबंधन बदल चुके हैं और हर बार अपनी शर्तों पर सौदेबाजी करने में कामयाब रहे हैं। इस बार भी जेडीयू ने चुनाव में 85 सीटें जीतकर एनडीए में अपनी ताकत साबित की है। भाजपा के 89 विधायकों ने भी उपमुख्यमंत्री के चुनाव में नीतीश कुमार के इशारे पर ही वोट किया था। इससे साफ है कि बिहार में असली नियंत्रण किसके हाथ में है। नीतीश कुमार की यह ताकत ही BJP के लिए आज सिरदर्द बनी हुई है।

आगे क्या होगा, गठबंधन टूटेगा या सुलझेगा?

फिलहाल एनडीए में खुली दरार के आसार नहीं हैं, लेकिन जेडीयू की इन मांगों ने गठबंधन की आंतरिक राजनीति को उजागर जरूर किया है। भाजपा नेतृत्व के सामने यह चुनौती है कि अगर मांगें मानी तो पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ेगा और अगर नहीं मानी तो नीतीश कुमार की नाराजगी का खतरा रहेगा। बिहार में 2025 के अंत तक विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होने से पहले यह मसला सुलझाना दोनों दलों के लिए जरूरी है। जेडीयू से कौन मंत्री बनेगा और बिहार के मंत्रियों की सूची कैसी होगी, यह सवाल अभी अनसुलझा है और बिहार की राजनीति पर इसकी गहरी छाप पड़ने वाली है।