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Raghav Chadda की बड़ी मांग: क्या अब जनता हटाएगी अपने सांसद?

Reported by: Ground Repoter | Written by: Srota Swati Tripathy | Agency: SN Media Network
Last Updated:

राघव चड्ढा की 'रिकॉल' मांग: संसद में गरमाई बहस खबर का सार AI ने दिया. न्यूज़ टीम ने रिव्यु किया.

  • आप सांसद राघव चड्ढा ने राज्यसभा में 'राइट टू रिकॉल' कानून की मांग की, जिससे मतदाता जनप्रतिनिधियों को कार्यकाल के बीच हटा सकें।
  • उन्होंने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने और सांसदों-विधायकों की जवाबदेही बढ़ाने वाला एक बड़ा कदम बताया।
  • इस मांग ने संसद और सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है, जिसमें इसके संभावित लाभ और राजनीतिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों पर चर्चा हो रही है।

संसद के बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में एक अहम मुद्दा उठा। आम आदमी पार्टी के सांसद Raghav Chadda ने केंद्र सरकार से मांग की कि देश में ऐसा कानून बने जिससे मतदाताओं को अपने सांसद या विधायक को कार्यकाल के बीच हटाने का अधिकार मिले। उन्होंने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया। इस मांग ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छेड़ दी है।

Raghav Chadda Recall Law की मांग: लोकतंत्र में जवाबदेही का नया अध्याय?

राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए Raghav Chadda ने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने के लिए “Right to Recall” जैसे प्रावधान पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव के बाद पांच साल तक जनता के पास अपने प्रतिनिधि को हटाने का कोई सीधा अधिकार नहीं होता, चाहे वह काम करे या नहीं।

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Right to Recall की व्यवस्था कुछ देशों और भारत के कुछ स्थानीय निकायों में सीमित रूप से लागू है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अभी कानून का हिस्सा नहीं है। अगर ऐसा कानून आता है तो यह electoral reform के बड़े एजेंडे का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है।संसद में इस मुद्दे पर अलग-अलग दलों की प्रतिक्रिया अलग रही। कुछ सांसदों ने इसे लोकतांत्रिक accountability बढ़ाने वाला कदम बताया, तो कुछ ने कहा कि इससे बार-बार चुनावी माहौल बन सकता है। फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस पर कोई ठोस घोषणा नहीं की गई है, लेकिन बहस जारी है।

क्या बदलेगा चुनावी सिस्टम? फायदे और चुनौतियां

अगर Right to Recall जैसा प्रावधान लागू होता है तो भारत की चुनावी प्रणाली में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे मतदाताओं को अधिक शक्ति मिलेगी। जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय और जिम्मेदार रहेंगे। यह democratic accountability को मजबूत कर सकता है।लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विशाल देश में बार-बार चुनाव कराना प्रशासनिक और आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है। इसके अलावा, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण इस प्रावधान का दुरुपयोग भी संभव है।

चुनावी सुधार (electoral reform) की बहस पहले भी होती रही है, जैसे एक देश-एक चुनाव, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर सख्ती, और चुनावी खर्च की पारदर्शिता। अब मतदाता अधिकार को लेकर उठी यह नई मांग भी उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में चुनावी घोषणापत्रों का हिस्सा बन सकता है। खासकर युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच इस तरह के सुधारों को लेकर रुचि बढ़ रही है।

फिलहाल यह साफ है कि संसद में उठी यह आवाज लोकतंत्र में जनता की भूमिका को लेकर नई चर्चा की शुरुआत कर चुकी है। आने वाले दिनों में सरकार का रुख क्या रहता है, इस पर सभी की नजरें टिकी

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जनता के हाथ में 'रिकॉल' पावर: क्या लोकतंत्र होगा मजबूत?


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Srota Swati Tripathy
Srota Swati Tripathy

जगन्नाथ की भूमि और नीले समंदर के किनारों से निकलकर झीलों के शहर भोपाल की एमसीयू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री कर रहे हैं। सीखने और समझने का दौर अभी भी जारी है। अब 'समस्तीपुर न्यूज़' के कंटेंट राइटर और अपने लेख के लिए जाने जाते हैं| ...और पढ़ें


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First Published : फ़रवरी 12, 2026, 12:06 पूर्वाह्न IST

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