Reserve Bank of India ने अपने Gold Reserve को लेकर बड़ा कदम उठाया है। पिछले छह महीनों में देश ने 100 टन से ज्यादा सोना विदेश से वापस भारत में शिफ्ट किया है। इस बदलाव को आर्थिक रणनीति के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है।सितंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच करीब 104.23 मीट्रिक टन सोना देश में लाया गया है। इसके बाद भारत में रखा गया कुल सोना बढ़कर 290.37 मीट्रिक टन हो गया है। हालांकि कुल गोल्ड रिजर्व में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है और यह करीब 880 टन के आसपास बना हुआ है।
Gold Reserve: विदेश से सोना वापस लाने की रणनीति क्या है?
भारत लंबे समय से अपने गोल्ड रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में सुरक्षित रखता रहा है। यह व्यवस्था सुरक्षा, तरलता और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की सुविधा के लिए की जाती है।लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और सोने की बढ़ती कीमतों को देखते हुए अब रणनीति में बदलाव दिखाई दे रहा है। देश अब अपने भंडार का ज्यादा हिस्सा घरेलू स्तर पर रखने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
फिलहाल भी करीब 197.67 मीट्रिक टन सोना Bank of England और Bank for International Settlements के पास सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा कुछ मात्रा गोल्ड डिपॉजिट के रूप में भी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि देश में सोना रखने से संकट के समय तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलती है और यह आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करता है।
गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़ने का क्या मतलब है?
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। मार्च 2026 तक यह हिस्सा 16.7% तक पहुंच गया, जो छह महीने पहले करीब 13.9% था। यह साफ संकेत देता है कि सोना अब रिजर्व का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।कुल विदेशी मुद्रा भंडार में अभी भी विदेशी मुद्रा संपत्ति (FCA) का दबदबा है, लेकिन धीरे-धीरे संतुलन बदला जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार कुल 552 अरब डॉलर के रिजर्व में से बड़ा हिस्सा सिक्योरिटीज में निवेश है, जबकि कुछ राशि अन्य केंद्रीय बैंकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में रखी गई है।
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यह बदलाव केवल एक तकनीकी कदम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक हालात को देखते हुए एक रणनीतिक निर्णय है। सोना हमेशा से सुरक्षित निवेश माना जाता है, खासकर तब जब बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है।एवरग्रीन नजरिए से देखें तो किसी भी देश के लिए मजबूत गोल्ड रिजर्व उसकी आर्थिक स्थिरता का संकेत होता है। ऐसे में यह कदम भारत को भविष्य की आर्थिक चुनौतियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार करने की दिशा में देखा जा रहा है।
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