The Kerala Story 2: फिल्म इंडस्ट्री में चल रहे विवाद के बीच केरल हाई कोर्ट ने फिल्म से जुड़े सर्टिफिकेशन मामले पर निर्माताओं को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म के ट्रेलर और कहानी से साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और सेंसर बोर्ड ने पर्याप्त सावधानी नहीं बरती। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर नई बहस शुरू कर रहा है।
The Kerala Story 2: हाई कोर्ट की टिप्पणी और सर्टिफिकेशन पर सवाल
हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि The Kerala Story 2 के टीज़र और ट्रेलर में दिखाए गए दृश्य कई राज्यों की महिलाओं को कथित धार्मिक परिवर्तन और षड्यंत्र से जोड़ते हैं, लेकिन शीर्षक केवल एक राज्य पर केंद्रित है। याचिकाकर्ता के अनुसार इससे गलत सामाजिक संदेश जा सकता है। अदालत ने इसी आधार पर निर्माताओं से जवाब मांगा है और सेंसर प्रक्रिया की जांच की जरूरत पर जोर दिया है।याचिका में यह भी कहा गया कि फिल्म का एक संवाद “अब सहेंगे नहीं… लड़ेंगे” दर्शकों को आक्रामक प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित कर सकता है। इसलिए इसे communal harmony, public order और film certification guidelines के दृष्टिकोण से परखा जाना जरूरी है।
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कानूनी पक्ष में सिनेमैटोग्राफ एक्ट की धारा 5B का हवाला दिया गया है, जिसमें ऐसे कंटेंट पर रोक का प्रावधान है जो सामाजिक शांति को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि बोर्ड ने पर्याप्त संशोधन या डिस्क्लेमर सुझाए बिना प्रमाणपत्र दे दिया। यह मुद्दा CBFC rules और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बहस को फिर से सामने लाता है।
पहली फिल्म का असर और आगे की कानूनी प्रक्रिया
मामले में 2023 में आई पहली फिल्म से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी उल्लेख किया गया है। उस समय निर्माताओं को स्पष्ट डिस्क्लेमर जोड़ना पड़ा था कि कुछ आंकड़े सत्यापित नहीं हैं और कहानी आंशिक रूप से काल्पनिक है। अब नई याचिका में कहा गया कि पिछली न्यायिक टिप्पणी के बावजूद सीक्वल के सामाजिक प्रभाव का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ।याचिका में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसा कंटेंट विभिन्न समुदायों के बीच तनाव बढ़ा सकता है।
हालांकि अदालत ने अभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि जवाब मांगकर आगे सुनवाई तय की है। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय सीधे सेंसर नहीं बल्कि प्रक्रिया की वैधता जांचना चाहता है।विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला भविष्य में फिल्मों के लिए एक मिसाल बन सकता है। डिजिटल दौर में फिल्में केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन गई हैं। इसलिए अदालतें अब legal scrutiny, freedom of expression और सामाजिक प्रभाव तीनों पहलुओं को साथ देखकर फैसला करती हैं।फिलहाल अगली सुनवाई तक <a href="
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