Samastipur Special: सच लिखना कभी गौरव की बात हुआ करता था, लेकिन आज वही सच कई पत्रकारों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। मैदान में उतरकर सच्चाई उजागर करने वाले इन रिपोर्टरों की ज़िंदगी हर दिन जोखिम से भरी है कहीं गोलियों का खतरा, तो कहीं सत्ता की चुप्पी का दबाव। सवाल बस एक है: क्या सच दिखाना अब गुनाह बन गया है?
पत्रकारिता में यह कभी नहीं कहा गया कि आप सच छुपाएं, बल्कि सच दिखाना ही पत्रकार की पहचान और अगर यही पहचान उनसे छीन ली जाए तो यह न केवल एक समाज के लिए बल्कि लोकतंत्र की अपमान की बात है। इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि कैसे अभी के समय में सच दिखाना कितना भारी पड़ सकते है।
न जाने कितने पत्रकारों ने जान गंवाई
भारत में पत्रकारिता अब खतरे का पर्याय बन चुकी है। जो कलम कभी समाज की आवाज़ बनती थी, आज उसी के कारण कई पत्रकारों की जान चली जाती है। सच्चाई उजागर करने की कीमत अब जान देकर चुकानी पड़ रही है। Committee to Protect Journalists (CPJ) की रिपोर्ट बताती है कि 1992 से 2025 के बीच भारत में 61 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है कभी गोली से, कभी धमकियों से और कभी रहस्यमयी हादसों में। इन पत्रकारों का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने झूठ के आगे झुकने से इनकार किया। यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, लोकतंत्र के ज़ख्म हैं।
- क्रॉस फायर का शिकार – 1
- खतरनाक असाइनमेंट के दौरान-16
- हत्या– 44
CPJ के अनुसार भारत में 1992-2025 तक कुल 61 पत्रकार मारे गए हैं।











