AI: भारत में तेजी से बढ़ती तकनीकी दौड़ के बीच एक नई बहस सामने आई है — क्या देश प्रतिभा से आगे है या स्किल से पीछे? ग्रामीण महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र की कहानी इस सवाल को और गहरा कर देती है। जहां एक छात्र मुफ्त ऑनलाइन टूल्स से खेती की बीमारी पहचानने वाला सिस्टम बना रहा है, वहीं 25 साल अनुभव वाले प्रोफेसर आधुनिक तकनीक तक पहुंच न होने की बात स्वीकार करते हैं। यही अंतर भारत के बढ़ते “स्किल गैप” की असली तस्वीर दिखाता है।
AI शिक्षा प्रणाली और सीखने का बदलता तरीका
भारत में पढ़ाई का पारंपरिक मॉडल अभी भी किताबों और पुराने सिलेबस पर आधारित है। कई कॉलेजों में पाठ्यक्रम अपडेट होने में वर्षों लग जाते हैं। दूसरी तरफ छात्र इंटरनेट के जरिए खुद सीख रहे हैं।यहीं पहली बार स्पष्ट होता है कि AI अब सिर्फ टेक कंपनियों की चीज नहीं रहा बल्कि स्व-अध्ययन का माध्यम बन गया है।आज का छात्र क्लासरूम से ज्यादा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से सीख रहा है। फ्री मॉडल्स, ओपन सोर्स कोड और क्लाउड कंप्यूटिंग की वजह से छोटे शहरों के छात्र भी नई तकनीक बना पा रहे हैं। लेकिन शिक्षक और संस्थान उसी रफ्तार से नहीं बदल पा रहे।
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इसी वजह से एक नई समस्या सामने आई — शिक्षा और इंडस्ट्री की जरूरतों में दूरी। विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या प्रतिभा की कमी नहीं बल्कि ट्रेनिंग की कमी है। कई छात्र बिना लैब के प्रोजेक्ट बना रहे हैं, जबकि कॉलेजों में कंप्यूट संसाधन सीमित हैं। इससे सीखने का जिम्मा संस्थानों से हटकर व्यक्ति पर आ गया है।
स्किल गैप क्यों बन रहा है और असर क्या होगा
भारत दुनिया के सबसे बड़े टेक टैलेंट पूल में गिना जाता है, फिर भी कंपनियां योग्य उम्मीदवार खोजने में कठिनाई बताती हैं। इसका कारण है — पढ़ाई और काम की जरूरतों का अलग-अलग होना।एक तरफ स्टार्टअप्स और इंडस्ट्री को प्रैक्टिकल स्किल चाहिए, दूसरी तरफ डिग्री अभी भी थ्योरी आधारित है। कई प्रोफेसर मानते हैं कि नई तकनीक सीखने के लिए समय, ट्रेनिंग और संसाधन दोनों की जरूरत है|
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