Bihar Chunav Opinion Analysis: बताते चले की 27 जुलाई 2025 को बिहार की राजनीति एक बार फिर उफान पर है। जैसे-जैसे बिहार चुनाव की तारीख़ें नज़दीक आ रही हैं, वैसे ही एनडीए और महागठबंधन के भीतर उठापटक तेज़ होती जा रही है। इस बार बवाल का केंद्र बने हैं चिराग पासवान और मुकेश सहनी। एक एनडीए में रहकर हमला कर रहे हैं तो दूसरा महागठबंधन से नाराज़गी जता रहे हैं। इस सियासी घमासान में बिहार की जनता को एक नया राजनीतिक मोड़ देखने को मिल रहा है।

चिराग पासवान का सियासी आक्रोश | Chirag Paswan Targets Nitish Kumar

Bihar chunav में चिराग पासवान और मुकेश सहनी की राजनीतिक रणनीति से एनडीए और महागठबंधन में मची हलचल
Chirag Paswan Targets Nitish Kumar

केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान बिहार की नीतीश सरकार पर लगातार हमला कर रहे हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि “बिहार लहूलुहान है” और “राज्य की कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।” चिराग ने यह भी कहा कि अगर उनके इस्तीफे से राज्य में कानून व्यवस्था सुधर सकती है तो वे एक मिनट की भी देरी नहीं करेंगे। उनके इस रुख से यह स्पष्ट है कि वे एनडीए में रहकर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर खुलकर निशाना साध रहे हैं।

2020 की रणनीति फिर से दोहराने की तैयारी

चिराग पासवान 2020 के विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार को निशाना बनाकर एनडीए को बड़ा नुकसान पहुंचा चुके हैं। उस वक्त उन्होंने भाजपा को “हनुमान” बताकर उसके खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारे थे, लेकिन जेडीयू के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल दिया था। अब फिर से वे उसी रणनीति पर चलते नजर आ रहे हैं। इस बार भी वे बिहार की सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कर चुके हैं।

NDA में दरार की नई शुरुआत

भले ही चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा हों, लेकिन उनके बयानों से गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार, 2020 में जेडीयू को 32 सीटों का नुकसान चिराग के कारण हुआ था, जिसके बाद चिराग को एनडीए से बाहर कर दिया गया था। चाचा पशुपति पारस के अलग होने के बाद पार्टी दो भागों में बंट गई। चिराग के आरोपों के मुताबिक, इस सबके पीछे नीतीश कुमार का हाथ था, जिन्होंने भाजपा पर दबाव बनाकर चिराग को साइडलाइन करवाया।

महागठबंधन में भी घमासान | Mukesh Sahni Demand Deputy CM Post

Bihar chunav में चिराग पासवान और मुकेश सहनी की राजनीतिक रणनीति से एनडीए और महागठबंधन में मची हलचल
Mukesh Sahni Demand Deputy Cm Post

वहीं दूसरी ओर महागठबंधन में वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी डिप्टी सीएम की मांग को लेकर सुर्खियों में हैं। उनका कहना है कि अगर उन्हें यह पद नहीं मिला, तो तेजस्वी यादव भी सीएम नहीं बन पाएंगे। सहनी की ये चेतावनी तेजस्वी को एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे रही है। उन्होंने महागठबंधन से 60 सीटों की मांग भी रख दी है, जो अन्य सहयोगी दलों के लिए असहज करने वाली स्थिति है।

2020 में भी सहनी ने दिखाई थी नाराजगी

यह पहली बार नहीं है जब मुकेश सहनी ने डिप्टी सीएम की मांग की है। 2020 में भी जब उन्हें महागठबंधन से यह पद नहीं मिला था, तो वे प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर चले गए थे। तब भाजपा ने उन्हें 11 सीटें दी थीं, और वीआईपी ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन बाद में उनके सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। अब एक बार फिर वही राजनीतिक ड्रामा दोहराया जा रहा है।

सीटों का समीकरण: एक नई चुनौती

महागठबंधन के लिए मुकेश सहनी की 60 सीटों की मांग किसी सिरदर्द से कम नहीं है। पिछली बार आरजेडी, कांग्रेस, वाम दलों ने जो सीटों पर चुनाव लड़ा था, वहां से किसी भी पार्टी की सीट काटना कठिन है। ऐसे में नए घटक दलों को एडजस्ट करना बड़ी चुनौती बन गया है। सहनी की वीआईपी और पारस की आरएलजेपी पहली बार महागठबंधन में शामिल हुए हैं, इसलिए उनके लिए सीटों का समायोजन असंभव जैसा लगता है।

तेजस्वी यादव की रणनीति पर असर | Tejashwi Yadav

तेजस्वी यादव पहले ही खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं। उनके और मुकेश सहनी के बीच सीटों को लेकर रस्साकशी साफ दिखाई दे रही है। अगर सहनी को समुचित सम्मान नहीं मिला, तो वे भी चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

Bihar Chunav 2025: दोनों गठबंधन संकट में

एनडीए हो या महागठबंधन, दोनों के सामने आंतरिक कलह सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। बिहार चुनाव का यह परिदृश्य साफ करता है कि यदि यह अंदरूनी खींचतान यूं ही जारी रही तो दोनों गठबंधन के लिए बिहार चुनाव में बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। जनता भी इन सियासी दांवपेंचों से थक चुकी है और उम्मीद कर रही है कि कोई ऐसा नेतृत्व सामने आए जो सचमुच बदलाव लाने वाला हो।

बिहार चुनाव की तैयारियों में जितनी तेजी आई है, उतनी ही तेजी से मतभेद भी उभरकर सामने आ रहे हैं। चिराग पासवान और मुकेश सहनी के हालिया तेवरों से यह स्पष्ट है कि यह चुनाव सिर्फ एनडीए और महागठबंधन की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि अंदर के नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं भी इस चुनाव को नई दिशा देंगी।

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