देश में रिश्तों और कानून से जुड़े एक अहम मुद्दे पर आज बड़ी न्यायिक बहस शुरू हो गई है। Supreme Court अदालत ने यह तय करने के लिए सुनवाई शुरू की है कि क्या शादी जैसे साथ रहने वाले संबंध में महिला दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज करा सकती है या नहीं। यह फैसला आने वाले समय में हजारों मामलों की दिशा बदल सकता है और आपराधिक कानून की सीमाओं को भी स्पष्ट करेगा।
क्या बिना शादी के दहेज कानून लागू हो सकता है?
अदालत के सामने उठे इस सवाल ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है कि क्या livein relationship, dowry, supreme court से जुड़ा मामला पारंपरिक विवाह कानूनों के दायरे में आएगा या नहीं। अब तक दहेज उत्पीड़न का कानून मुख्य रूप से वैध विवाह पर लागू माना जाता रहा है, लेकिन बदलती सामाजिक संरचना के कारण अदालत को इसकी व्याख्या पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
याचिका कर्नाटक के एक डॉक्टर ने दायर की है, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। उनका कहना है कि यदि दो लोग बिना शादी साथ रहते हैं तो उस संबंध को आपराधिक कानून में विवाह के बराबर मानना सही नहीं होगा। अदालत ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों से जवाब मांगा है।यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। देश में बढ़ते सहजीवन मामलों के कारण पुलिस और अदालतों के सामने बार-बार ऐसी कानूनी स्थिति बनती है जहां तय करना मुश्किल हो जाता है कि संबंध वैवाहिक था या नहीं। इसलिए अब यह सुनवाई एक मिसाल बन सकती है।
Supreme Court फैसला क्यों बनेगा बड़ा कानूनी मिसाल?
कानून विशेषज्ञों के अनुसार अगर Supreme Court सहजीवन को विवाह जैसा मान लेती है तो दहेज कानून का दायरा बहुत बढ़ जाएगा। इससे महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी, लेकिन झूठे मामलों की आशंका पर भी बहस तेज हो सकती है। दूसरी ओर यदि इसे विवाह से अलग माना जाता है तो पीड़ित महिलाओं को राहत पाने में मुश्किल बढ़ सकती है।
यह मामला समाज में बदलते रिश्तों की वास्तविकता को भी सामने लाता है। शहरों में साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि कानून अभी भी पारंपरिक विवाह की अवधारणा पर आधारित है। अदालत इसी अंतर को समझकर स्पष्ट दिशा तय करना चाहती है।केंद्र सरकार से भी राय मांगी गई है ताकि भविष्य में कानून संशोधन की जरूरत पड़े तो स्पष्ट आधार मिल सके। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में पुलिस और ट्रायल कोर्ट को स्पष्ट दिशानिर्देश दिए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला फैसला सिर्फ दहेज मामलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घरेलू हिंसा, संपत्ति अधिकार और भरण-पोषण जैसे कई मुद्दों पर प्रभाव डालेगा। यही कारण है कि इसे हाल के वर्षों का सबसे अहम पारिवारिक कानून विवाद माना जा रहा है।
यह सुनवाई भारतीय समाज में रिश्तों की बदलती परिभाषा और कानून की पारंपरिक संरचना के बीच संतुलन तय करेगी। फैसला आने के बाद सहजीवन संबंधों से जुड़े हजारों लंबित मामलों पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।
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