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UGC New Rules Guidelines से हायर एजुकेशन में भूचाल! समानता के नाम पर क्यों भड़का विरोध?

देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में इन दिनों UGC New Rules Guidelines को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक इस मुद्दे पर चर्चा

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UGC New Rules Guidelines से हायर एजुकेशन में भूचाल! समानता के नाम पर क्यों भड़का विरोध?
UGC New Rules Guidelines से हायर एजुकेशन में भूचाल! समानता के नाम पर क्यों भड़का विरोध? (PC-Social Media)
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देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में इन दिनों UGC New Rules Guidelines को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक इस मुद्दे पर चर्चा तेज है। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (University Grants Commission) ने हाल ही में Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 जारी किए हैं। आयोग का दावा है कि इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करना है, जबकि जनरल कैटेगरी के एक बड़े वर्ग का कहना है कि ये नियम कैंपस में नए विवाद और विभाजन को जन्म दे सकते हैं।

UGC New Rules Guidelines क्या हैं नए नियम और क्यों हुआ बवाल

नए नियमों के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को समानता अवसर केंद्र (Equity Opportunity Centre) बनाना अनिवार्य किया गया है। अब इन केंद्रों में एससी-एसटी के साथ-साथ ओबीसी वर्ग के छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ हुए कथित भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। इससे पहले 2012 के नियमों में यह अधिकार केवल एससी-एसटी वर्ग तक सीमित था।

इसके अलावा हर संस्थान में एक इक्विटी कमिटी गठित करनी होगी, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी तय की गई है। शिकायत दर्ज होते ही 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक कार्रवाई शुरू करनी होगी और 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करना अनिवार्य होगा। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो चेतावनी, जुर्माना, निलंबन या निष्कासन जैसी सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी रखा गया है।

UGC का कहना है कि यह व्यवस्था कैंपस में सुरक्षित और समान माहौल बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। आयोग इसे सुधारवादी और समावेशी पहल बता रहा है।

जनरल कैटेगरी का विरोध और उठ रहे सवाल

दूसरी ओर, जनरल कैटेगरी से जुड़े संगठनों और छात्रों का कहना है कि ये नियम एकतरफा हैं। सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड कर रहा है। विरोध करने वालों का तर्क है कि नियमों में भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे झूठी शिकायतों की आशंका बढ़ जाती है।

आलोचकों के अनुसार नए नियमों में 2012 के उस प्रावधान को हटा दिया गया है, जिसमें झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का जिक्र था। उनका कहना है कि इससे बिना सबूत आरोप लगाना आसान हो जाएगा और किसी छात्र या शिक्षक का करियर खतरे में पड़ सकता है। इसके अलावा इक्विटी कमिटी में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य न करने पर भी सवाल उठ रहे हैं।

विरोध करने वाले इसे सामान्य बनाम अन्य वर्ग का मुद्दा बताते हुए कह रहे हैं कि इससे कैंपस का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो सकता है।

क्यों जरूरी समझे गए ये नियम

इन नियमों की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां अहम मानी जा रही हैं। रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद हुई घटनाओं ने देशभर में चिंता बढ़ाई थी। इन मामलों में पीड़ित परिवारों द्वारा दाखिल जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने UGC को भेदभाव रोकने के लिए मजबूत और अपडेटेड नियम लाने के निर्देश दिए थे।

UGC की रिपोर्ट के अनुसार, 2019-20 में जहां भेदभाव की 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई। पांच साल में कुल 1160 शिकायतें सामने आना आयोग के लिए चेतावनी मानी गई। हालांकि, आलोचक यह भी कहते हैं कि देशभर के हजारों कॉलेजों और करोड़ों छात्रों के अनुपात में यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल UGC अपने फैसले पर कायम है, लेकिन बढ़ते विरोध को देखते हुए आने वाले दिनों में सरकार या आयोग की ओर से स्पष्टीकरण या संशोधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह मुद्दा अब सिर्फ नियमों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समानता बनाम दुरुपयोग की बहस में बदल चुका है। आने वाला समय तय करेगा कि ये नियम कैंपस में संतुलन बनाएंगे या विवाद को और गहरा करेंगे।

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Srota Swati Tripathy
लेखक के बारे मेंBy Srota Swati Tripathy
जगन्नाथ की भूमि और नीले समंदर के किनारों से निकलकर झीलों के शहर भोपाल की एमसीयू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री कर रहे हैं। सीखने और समझने का दौर अभी भी जारी है। अब 'समस्तीपुर न्यूज़' के कंटेंट राइटर और अपने लेख के लिए जाने जाते हैं|
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