Bihar News: बताते चले की 22 फरवरी 2026 को बिहार सरकार ने राज्य की पारंपरिक कला और शिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम की घोषणा की है। मधुबनी के रांटी और दरभंगा के रैयाम समेत चार ऐतिहासिक कला-गांवों को क्राफ्ट विलेज के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है। इस पहल से स्थानीय कलाकारों को बाजार, प्रशिक्षण और पर्यटन से सीधा जुड़ाव मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। यह पहल Bihar के परिप्रेक्ष्य में राज्य की सांस्कृतिक नीति का बड़ा संकेत मानी जा रही है।

रांटी और रैयाम बनेंगे पारंपरिक कला के नए केंद्र

मिथिला क्षेत्र की पहचान सदियों पुरानी लोकचित्रकला और हस्तशिल्प से रही है। मधुबनी का रांटी गांव और दरभंगा का रैयाम लंबे समय से मिथिला कला, कागज़ी चित्रकला और पारंपरिक शिल्पकला के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। सरकार की नई योजना के अनुसार इन गांवों में कलाकारों के लिए कार्यस्थल, प्रशिक्षण केंद्र, प्रदर्शनी स्थल और पर्यटक सुविधाओं का विकास किया जाएगा।

इस तरह का मॉडल पहले मधुबनी जिले के जितवारपुर में सफल माना गया है, जहां स्थानीय कलाकारों को स्थायी बाजार और पहचान मिली। उसी अनुभव के आधार पर अब रांटी और रैयाम को विकसित किया जाएगा। इससे कलाकारों को गांव छोड़कर शहरों में जाने की जरूरत कम होगी। स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर मिलेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी क्षेत्र की कला को पर्यटन से जोड़ा जाता है, तो वहां की सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रहती है। रांटी और रैयाम में भी यही रणनीति अपनाई जाएगी। यहां आने वाले पर्यटक न केवल कला खरीदेंगे बल्कि निर्माण प्रक्रिया भी देख सकेंगे। इससे कला के प्रति जागरूकता और मांग दोनों बढ़ेगी।

क्राफ्ट विलेज मॉडल से कलाकारों को मिलेगा स्थायी बाजार

क्राफ्ट विलेज या शिल्पग्राम की अवधारणा का मुख्य उद्देश्य यह है कि कलाकारों को अपने उत्पाद बेचने के लिए स्थायी और विश्वसनीय मंच मिले। अक्सर ग्रामीण कलाकार बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं, जिससे उन्हें उचित मूल्य नहीं मिल पाता। नए शिल्पग्राम मॉडल में सरकार सीधे बाजार और कलाकार को जोड़ने की कोशिश कर रही है।

रांटी और रैयाम जैसे गांवों में कला पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। लेकिन आधुनिक शिक्षा और रोजगार के दबाव में नई पीढ़ी इस परंपरा से दूर हो रही थी। यदि गांव में ही प्रशिक्षण, प्रदर्शन और बिक्री की व्यवस्था होगी तो युवा भी इसे पेशे के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।

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इसके अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी इन शिल्पग्रामों को जोड़ा जाएगा। इससे स्थानीय उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकेंगे। यह मॉडल केवल सांस्कृतिक संरक्षण नहीं बल्कि ग्रामीण आर्थिक विकास का भी माध्यम बन सकता है। जब कला और आजीविका का संबंध मजबूत होता है, तो परंपरा लंबे समय तक जीवित रहती है।

पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार

कला-आधारित पर्यटन आज विश्वभर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। पर्यटक अब केवल ऐतिहासिक स्थल ही नहीं बल्कि स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली को भी अनुभव करना चाहते हैं। इसी अवधारणा को ध्यान में रखते हुए बिहार के इन गांवों को सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने की योजना है।

रांटी और रैयाम में जब शिल्पग्राम विकसित होंगे, तो वहां सड़क, आवास, मार्गदर्शन केंद्र और स्थानीय उत्पाद बाजार जैसी सुविधाएं भी बढ़ेंगी। इससे छोटे दुकानदार, परिवहन सेवा, भोजनालय और होम-स्टे जैसे नए रोजगार अवसर बनेंगे। ग्रामीण क्षेत्र में आय के स्रोत बढ़ेंगे और पलायन कम हो सकता है।

लंबे समय में यह पहल बिहार की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगी। मिथिला कला पहले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है, लेकिन संगठित ढांचे की कमी के कारण इसका पूरा आर्थिक लाभ स्थानीय समुदाय तक नहीं पहुंच पाता था। शिल्पग्राम मॉडल उस कमी को दूर कर सकता है। यदि योजना समय पर लागू होती है, तो रांटी और रैयाम जैसे गांव वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर स्थायी स्थान बना सकते हैं।

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